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मंगलवार, 28 मार्च 2017
रविवार, 26 मार्च 2017
शुरू हुई चिकन की खेती... अब बिना हलाल के खाइए मुर्गा
BBE THIINKOON
अमेरिका ने चिकन की खेती कर दी है. अमेरिका के एक फूड स्टार्टअप मेम्फिस मीट्स ने दुनिया में पहली बार लैब में चिकन तैयार करने का दावा किया है.
सोचिए आपको चिकन खाने को मिले और मुर्गे की मारने की भी जरूरत न पड़े तो... आप सोच रहे होंगे कि ये क्या बेतुकी बात है. लेकिन अमेरिका ने ऐसा कर दिखाया है. अमेरिका ने चिकन की खेती कर दी है. अमेरिका के एक फूड स्टार्टअप मेम्फिस मीट्स ने दुनिया में पहली बार लैब में चिकन तैयार करने का दावा किया है.
यानी ऐसा चिकन जिसके लिए किसी मुर्गे को मारने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यानी पशु प्रेमी भी खुश और आपको मिलेगा वैसा ही टेस्ट.
कंपनी की रिसर्च टीम ने इसे लैब में सेल्फ-रिप्रोड्यूसिंग सेल्स से तैयार किया है. इसके लिए रिसर्च टीम ने चिकन की एक सिंगल सेल (कोशिका) का इस्तेमाल किया है. इसका खुलासा 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में छपी एक रिपोर्ट में किया गया है.
रिपोर्ट के अनुसार इस हफ्ते की शुरुआत में कम्पनी ने कुछ स्वाद प्रेमियों को बुलाकर अपने लैब में बनाए हुए चिकन और डक का स्वाद भी टेस्ट करवाया. रिपोर्ट के मुताबिक ये काफी सफल रहा. जिन लोगों ने भी इस चिकन को चखा, उनका कहना था कि इसका स्वाद बिलकुल असली चिकन और डक के मीट से मिलता-जुलता है और वे इसे दोबारा खाना पसंद करेंगे.
फायदे भी बहुत * जानवरों को मारना नहीं पड़ेगा* बड़ी आबादी के लिए फूद मुहैया हो पाएगा. * लैब में मीट उत्पादन से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रुकेगा* जानवरों को बड़ी मात्रा में एंटीबायोटिक्स खिलाई जाती हैं. इससे एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस होने का खतरा पैदा हो गया है. उस पर भी रोक लगेगी.
BBE THIINKOON
BBE THIINKOON
अमेरिका ने चिकन की खेती कर दी है. अमेरिका के एक फूड स्टार्टअप मेम्फिस मीट्स ने दुनिया में पहली बार लैब में चिकन तैयार करने का दावा किया है.
सोचिए आपको चिकन खाने को मिले और मुर्गे की मारने की भी जरूरत न पड़े तो... आप सोच रहे होंगे कि ये क्या बेतुकी बात है. लेकिन अमेरिका ने ऐसा कर दिखाया है. अमेरिका ने चिकन की खेती कर दी है. अमेरिका के एक फूड स्टार्टअप मेम्फिस मीट्स ने दुनिया में पहली बार लैब में चिकन तैयार करने का दावा किया है.
यानी ऐसा चिकन जिसके लिए किसी मुर्गे को मारने की जरूरत नहीं पड़ेगी. यानी पशु प्रेमी भी खुश और आपको मिलेगा वैसा ही टेस्ट.
कंपनी की रिसर्च टीम ने इसे लैब में सेल्फ-रिप्रोड्यूसिंग सेल्स से तैयार किया है. इसके लिए रिसर्च टीम ने चिकन की एक सिंगल सेल (कोशिका) का इस्तेमाल किया है. इसका खुलासा 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में छपी एक रिपोर्ट में किया गया है.
रिपोर्ट के अनुसार इस हफ्ते की शुरुआत में कम्पनी ने कुछ स्वाद प्रेमियों को बुलाकर अपने लैब में बनाए हुए चिकन और डक का स्वाद भी टेस्ट करवाया. रिपोर्ट के मुताबिक ये काफी सफल रहा. जिन लोगों ने भी इस चिकन को चखा, उनका कहना था कि इसका स्वाद बिलकुल असली चिकन और डक के मीट से मिलता-जुलता है और वे इसे दोबारा खाना पसंद करेंगे.
फायदे भी बहुत * जानवरों को मारना नहीं पड़ेगा* बड़ी आबादी के लिए फूद मुहैया हो पाएगा. * लैब में मीट उत्पादन से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रुकेगा* जानवरों को बड़ी मात्रा में एंटीबायोटिक्स खिलाई जाती हैं. इससे एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस होने का खतरा पैदा हो गया है. उस पर भी रोक लगेगी.
BBE THIINKOON
शनिवार, 25 मार्च 2017
शनिवार, 18 मार्च 2017
बुधवार, 18 जनवरी 2017
Unknown
8:21:00 am
इस हिन्दू सम्राट ने अरबों को इस तरह खदेड़ा कि 500 साल तक भारत की ओर नहीं मुड़े थे अरब !
अन्य राष्ट्रों समेत हिन्दू बहुल भारत की धरती पर हिन्दुओ के “इतिहास” के साथ हमेशा अन्याय किया गया हैं। न जाने, हिन्दुओं का इतिहास मिटाने और छिपाने के कितने ही प्रयास किये गए। मगर सच कभी छिपता नहीं!
महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, पुष्यमित्र शुंग, राजा दाहिर के नाम तो अक्सर सुनने को मिल जाते हैं, मगर वीर बप्पा रावल के नाम को शायद ही कोई जनता हो!
महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, पुष्यमित्र शुंग, राजा दाहिर के नाम तो अक्सर सुनने को मिल जाते हैं, मगर वीर बप्पा रावल के नाम को शायद ही कोई जनता हो!
उन्होंने अरबी, तुर्क और फारसी मुस्लिमों के दिल में इतनी दहशत भर दी थी कि मुसलमानों ने अगले 400 साल तक हिंदुस्तान की ओर आँख उठा के नहीं देखा।
ऐसे योद्धा थे मेवाड़ वंश के संथापक, कालभोज के राजकुमार ‘बाप्पा रावल’! साथ ही शिव के एकलिंग रूप के भक्त और चितौड़ के किले के निर्माता!
उनके पिता महेंद्र रावल द्वितीय की आक्रमणकारियों के हत्या की थी और उनकी माता जी अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए सती हो गयी थी।
बप्पा रावल का पालन पोषण उनके कुलपुरोहित ने बड़े प्यार से किया और एकलिंग जी की भक्ति के साथ साथ समस्त युद्ध लालाओ में निपुण बनाया।
बप्पा रावल ने अपना खोया हुआ राज्य मात्र 21 साल की उम्र में वापस ले लिया था और एक कुशल शासक के रूप में अपने को स्थापित किया।
ऐसे योद्धा थे मेवाड़ वंश के संथापक, कालभोज के राजकुमार ‘बाप्पा रावल’! साथ ही शिव के एकलिंग रूप के भक्त और चितौड़ के किले के निर्माता!
उनके पिता महेंद्र रावल द्वितीय की आक्रमणकारियों के हत्या की थी और उनकी माता जी अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए सती हो गयी थी।
बप्पा रावल का पालन पोषण उनके कुलपुरोहित ने बड़े प्यार से किया और एकलिंग जी की भक्ति के साथ साथ समस्त युद्ध लालाओ में निपुण बनाया।
बप्पा रावल ने अपना खोया हुआ राज्य मात्र 21 साल की उम्र में वापस ले लिया था और एक कुशल शासक के रूप में अपने को स्थापित किया।
मगर भारत के वामपंथी एवं भाड़े के इतिहासकारों ने उनके नाम को मिटाने और छिपाने की कोशिश की!
रावलपिण्डी का नामकरण बप्पा रावल के नाम पर हुआ था। इससे पहले तक रावलपिंडी को गजनी प्रदेश कहा जाता था। तब कराची का नाम भी ब्रह्माणावाद था।
रावलपिण्डी का नामकरण बप्पा रावल के नाम पर हुआ था। इससे पहले तक रावलपिंडी को गजनी प्रदेश कहा जाता था। तब कराची का नाम भी ब्रह्माणावाद था।
गजनी प्रदेश में बप्पा ने सैन्य ठिकाना स्थापित किया था। वहां से उनके सैनिक अरब सेना की गतिविधियों पर नजर रखते थे। उनकी वीरता से प्रभावित गजनी के सुल्तान ने अपनी पुत्री का विवाह भी उनसे किया था। मेवाड़ में बप्पा व दूसरे प्रदेशों में इस वीर शासक को बापा भी पुकारा जाता था।
हारीत ऋषि का आशीर्वाद मिला
हारीत ऋषि का आशीर्वाद मिला
ईडर के गुहिल वंशी राजा नागादित्य की हत्या के बाद उनकी पत्नी तीन साल के पुत्र बप्पा को लेकर बडऩगरा (नागर) जाति के कमलावती के वंशजों के पास ले गईं।
उनके वंशज गुहिल राजवंश के कुल पुरोहित थे। भीलों के आतंक से फलस्वरूप कमला के वंशधर ब्राह्मण, बप्पा को लेकर भांडेर नामक स्थान पर आ गए। यहां बप्पा गायें चराने लगे। इसके बाद नागदा आए और ब्राह्मणों की गायें चराने लगे।
उनके वंशज गुहिल राजवंश के कुल पुरोहित थे। भीलों के आतंक से फलस्वरूप कमला के वंशधर ब्राह्मण, बप्पा को लेकर भांडेर नामक स्थान पर आ गए। यहां बप्पा गायें चराने लगे। इसके बाद नागदा आए और ब्राह्मणों की गायें चराने लगे।