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शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

2:49:00 pm

नाक में अंगुली करें और धोएं नहीं...बहुत फायदे की चीज है!

नाक में अंगुली करें और धोएं नहीं...बहुत फायदे की चीज है!




नाक में हाथ डालने हर कोई शर्म महसूस करता है तथा दूसरों को भी यह देखना अच्छा नहीं लगता है। कुछ लोग ऐसा देखकर उल्टियां करने लगते है। परंतु केनेडियन बॉयोकेमिस्ट्री के प्रोफ्रेसर का इस बारे में कुछ और ही कहना है। प्रोफेसर ने इस पर एक अध्ययन किया।

प्रोफेसर के अनुसार नाक में उंगली डालना और फिर हाथों को हाथो हाथ साफ किए बिना खाना खा लेने से सेहत अच्छी बनी रहती है। ये उनका कहना है।

केनेडियन प्रोफेसर का अध्ययन कहता है कि नोज पिक यानिकी नाक साफ करने के बाद उससे निकलने वाले बूगर को खाने से सेहत को अनेक फायदे मिलते हैं। यह हमारे शरीर से खतरनाक जर्मस के लिए प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है।


जिससे हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूती मिलती है। लोग इसे अपनी नाक और सेहत के लिए गंदा मानते हैं, लेकिन ऐसा करना वास्तव में फायदेमंद होता है।

2:47:00 pm

इच्‍छाधारी नागिन ने फिर लिया जन्‍म, देखने के लिए दूर-दूर से पहुंच रहे लोग

इच्‍छाधारी नागिन ने फिर लिया जन्‍म, देखने के लिए दूर-दूर से पहुंच रहे लोग

खुद को बताती है इच्‍छाधारी नागिन
भोपाल के गुना जिले के मृगवास से 6 किमी दूर स्थित जोहरीपुरा गांव की रहनेवाली 19 वर्षीय रचना अहिरवार को आसपास के गांव के लोग भी नागिन के नाम से जानते हैं। कुछ वर्ष पूर्व पड़ोस के गांव के एक युवक से रचना की शादी हुई थी। शादी के कुछ दिनो बाद ही रचना के अजीब बर्ताव की वजह से उसके ससुराल वाले उसे मायके छोड़ कर चले गए। रचना के ससुराल वालों ने बताया कि वह अचानक नागिन की तरह बर्ताव करने लगती है। उस दौरान रचना संभालना मुश्किल हो जाता है।

नाग है जिदां तो करती है नागिन जैसा बर्ताव
रचना बताती है कि पूर्व जन्‍म में वह एक नागिन थी। 20 साल पहले चरवाहों के एक समूह ने मारकर जला दिया था। रचना का कहाना है कि उस जन्‍म में उसका पति नाग अब भी जिंदा है। उस नाग की वजह से अक्सर उसके व्‍यवहार में परिवर्तन आने लगता है। रचना के पिता ने बताया कि वे अपनी बेटी को ठीक देखना चाहते हैं। एक आम पिता की तरह उन्हें भी अपनी बेटी की चिंता है। रचना के इस बर्ताव ने उसका जीवन बरबाद कर दिया है। उन्होंने कई बाबाओं और ओझा से रचना का इलाज करवाया पर कोई फायदा नहीं हुआ है।

गांव के लोग रचना को नागिन की तरह पूजते हैं
इस घटना के बाद उसे पूरा गाँव ही नहीं बल्कि आस-पास के गाँव के लोग भी नागिन के नाम से जानने लगे हैं। वे उसका नागिन की तरह ही सम्मान भी करते हैं। हालांकि एक तांत्रिक ने उसके अन्दर से कतिथ नागिन को निकालने का प्रयास भी किया था लेकिन उसके बाद भी कोई फायदा नहीं हो पाया। इस मामले में विशेषज्ञों की माने तो रचना किसी मानसिक बिमारी से ग्रस्त है। इसलिए उसे दवाओं और इलाज की ज़रूरत है।

11:54:00 am

तुलसी की पूजा सभी करते हैं, पर इस तरह की गई पूजा मनोकामना पूर्ण होती है

तुलसी की पूजा सभी करते हैं, पर इस तरह की गई पूजा मनोकामना पूर्ण होती है

बात करेंगे तुलसी के पौधे की। उसके औषधीय गुणों के बारे में तो आपने काफी कुछ पढ़ा होगा, आपको बतायेंगे उसके प्रभाव अपके जीवन पर। तुलसी का पौधा लगाकर अप अपने घर के दोषों से मुक्ति पा सकते हैं।

तुलसी मुख्यतः दो प्रकार की होती है। 1- श्वेत तुलसी, 2- कृष्ण तुलसी। इन्हे क्रमशः राम तुलसी और श्याम तुलसी भी कहते हैं। दोनो प्रकार की तुलसी में केवल वर्ण भेद ही होता है अन्यथा गुणों में समानता होती है। वर्षो पहले से ही घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगाने की परम्परा प्रचलित है। महिलायें इसकी प्रतिदिन पूजा करके जल अर्पित करती है। घर से निकलने से पूर्व तुलसी के दर्शन करना शुभ माना जाता है। तुलसी का वृक्ष औषधीय गुणों से परिपूर्ण माना गया है। इनकी पत्तियों में कीटाणु नष्ट करने का एक विशेष गुण है। इसलिये मन्दिरों में चरणोदक जल में तुलसी की पत्तियां तोड़कर डाली जाती है जिससे जल के सारे कीटाणु नष्ट हो जाये और जल शुद्ध हो जाये।

1-यदि कोई भी व्यक्ति तुलसी की माला से किसी भी लक्ष्मी मन्त्र का यथा शक्ति 1 से 11 माला प्रतिदिन जप करे तो धन की प्राप्ति होने लगती है और उसके परिवार में सुख समृद्धि आती है।

2- जो भी व्यक्ति नित्य सुबह के समय स्नान आदि से निवृत होकर तुलसी के नीचे दीपक जलाकर पूजन करेगा। उस जातक के देवदोष समाप्त हो जायेंगे।

3- एक गमले में एक पौधा तुलसी का तथा एक पौधा काले धतूरे का लगायें। इन दोनों पौधों पर प्रतिदिन स्नान आदि से निवृत होकर शुद्ध जल में थोड़ा सा कच्चा दूध मिलाकर अर्पित करें। जो भी व्यक्ति यह प्रयोग नित्य 1 वर्ष तक करेगा उसे पितृदोष से मुक्ति मिल जायेगी। तथा उसको ब्रहमा, विष्णु, महेश, इन तीनों की संयुक्त पूजा फल मिलेगा चूंकि विष्णु प्रिया होने के कारण तुलसी विष्णु रूप है तथा काला धतूरा शिव रूप है एंव तुलसी की जड़ो में ब्रहमा का निवास स्थान माना जाता है।

4- एक छोटा सा चांदी का सर्प बनावाकर। इस सर्प की पूजा जिस दिन चर्तुदशी हो उस दिन स्नान कर तुलसी के पौधे के नीचे, इसे रखकर। इस पर दूध, अक्षत, रोली, आदि लगाकर इसकी पूजा करें। घी का दीपक भी जलायें। जिस समय पूजा करें उस समय साधक का मुख पूर्व दिशा की तरफ होना चाहिए। भोग अर्पित कर दान भी करें। दीपक जब ठण्डा हो जाये तो उसके बाद चाॅदी के सर्प को पूजा करने वाला व्यक्ति ही उठाकर किसी नदीं में प्रवाहित कर दे। इस प्रकार नित्य 40 दिन तक पूजन करने से कालसर्प दोष दूर हो जाता है।

तुलसी पूजन करते समय यह मंत्र का पाठ करें

तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी।
धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमनः प्रिया।।
लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्।
तुलसी भूर्महालक्ष्मीः पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।।

तुलसी पूजन में तुलसी को जल देते समय यह मंत्र पढ़े-

महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी

आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते।।

अर्थात्हे तुलसी! आप सम्पूर्ण सौभाग्यों को बढ़ाने वाली हैं। सदा आधि-व्याधि को मिटाती हैं। आपको नमस्कार है।

तुलसी स्तुति

देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः

नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये।।

तुलसी के पत्ते तोड़ते समय यह मंत्र बोले -

मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानन्द कारिणी

नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमोस्तुते ।।

तुलसी पत्र तोड़ने के भी नियम है-

अमावस्या, चैादस तिथि को तुलसी नहीं तोड़ना चाहिए। रविवार, शुक्रवार और सप्तमी तिथि को भी तुलसी नहीं तोड़ना चाहिए। तुलसी से पत्र तोड़ते समय देवी तुलसी से पत्र तोड़ने की इजाजत लेनी चाहिए। अकारण ही तुलसी पत्र नहीं तोड़ना चाहिए। बल्कि झड़कर नीचे गिरे हुए तुलसी पत्र को पूजन व दवा आदि कार्यों में उपयोग लाना उत्तम तरीका है।

वायु पुराण में तुलसी पत्र तोड़ने के संबंध में कहा गया है -

अस्नात्वा तुलसीं छित्वा यः पूजा कुरुते नरः ।

सोऽपराधी भवेत् सत्यं तत् सर्वनिष्फलं भवेत्।।

अर्थात् बिना स्नान किए तुलसी को तोड़कर जो मनुष्य पूजा करता है। वह अपराधी है। उसकी की हुई पूजा निष्फल जाती है। इसमें कोई शंका नहीं।

8:09:00 am

11 reasons why the Hollow Earth actually exists


11 reasons why the Hollow Earth actually exists

Is it possible that there is a completely unknown civilization living beneath the surface of our planet? Many people believe that the Hollow Earth theory is more than just a myth, and some have even tried to prove it scientifically. Even today, in the 21st century, it’s difficult to say with certainty that it does or does not exist.

For many years it was believed that the earth was hollow, but even though many have come up with theories, until 1968 there was no proof. That year, pictures taken by a satellite orbiting Earth clearly showed a gaping hole located at the North Pole; enough evidence to support the hollow Earth theory according to many.

Is there a hole in the North Pole? In the early 1970’s, ESSA, a project belonging to the Department of Commerce of the United States, gave media access to images of the North Pole taken by the ESSA-7 satellite on November 23, 1968. One of the photographs showed the North Pole covered by the usual cloud; the other one showed the same area without clouds, revealing a huge hole where the pole was supposed to be located.Vice Admiral Richard E. Byrd of the US Navy was a distinguished pioneer aviator and polar explorer who flew over the North Pole on May 9, 1926 and led numerous expeditions to Antarctica, including a flight over the South Pole on 29 November 1929. Between 1946 and 1947, he and his team carried out a large-scale operation called “High Jump”, during which he discovered and mapped 1,390,000 km² of the Antarctic territory. The famous Byrd expeditions first entered in dispute of the hollow Earth theories when several articles and books like Worlds beyond the Polesby Amadeo Giannini claimed that Byrd had not flown over the Pole but inwardly through large holes leading into the Earth.The possibility that the earth is hollow, and that it can be accessed through the North and South poles, and that secret civilizations flourish within it, has spurred the imagination of people through centuries. Evidence of this we find in the history of countless ancient civilizations. The Babylonian hero Gilgamesh visited his ancestor Utnapishtim in the bowels of the earth; in Greek mythology, Orpheus tries to rescue Eurydice from the underground hell; it was said that the Pharaohs of Egypt communicated with the underworld, which could be accessed via secret tunnels hidden in the pyramids; and Buddhists believed (and still believe) that millions of people live in Agharta, an underground paradise ruled by the king of the world.Leonard Euler, a mathematical genius of the eighteenth century, concluded that the Earth was hollow, containing a central sun and was inhabited; and Dr. Edmund Halley, discoverer of Comet Halley and Royal Astronomer of England also believed that the Earth was hollow on the inside with three “Floors”.A map of the third Reich shows several secret passages depicted which were used by German U-Boats to access mysterious underground regions, as well as a complete map of both hemispheres and the mysterious kingdom of Agartha.Karl Unger a crew member aboard a U-Boat commanded by Heinrich Brodda wrote letters stating that the crew had reached the interior of the Earth and that they did not consider coming back.In the incredible maps of the Third Reich, the Antarctic continent can be observed without its thick layer of ice. But the most intriguing detail are the presence of underwater passages spanning across the entire continent and seem to converge at the exact location which is identified as the opening towards the Hollow Earth or Inner Earth.The Macuxi Indians knew about the existence of the Hollow Earth nearly one hundred years ago. The Macuxi Indians are indigenous people who live in the Amazon, in countries such as Brazil, Guyana and Venezuela. According to their legends, they are the descendants of the Sun’s children, the creator of Fire and disease and the protectors of the “inner Earth.”Their legends speak of an entrance into Earth. Until the year 1907, the Macuxies would enter some sort of cavern, and travel from 13 to 15 days until they reached the interior. It is there, “at the other side of the world, in the inner Earth” is where the Giants live, creatures that have around 3-4 meters in height.Oh and… There is a huge Ocean beneath the surface of our planet. Scientists have not long ago, discovered a large ocean of water inside the mantle of Earth, and they point out that it is a large water “tank” that could fill the oceans on Earth three times. This incredible discovery suggests that the surface water of the planet came from within Earth, as part of a “complete water cycle on the planet” instead of the dominant theory proposed that water arrived to Earth by icy comets that passed by the planet millions of years ago.According to John Cleves Symmes Jr, an American officer, trader and lecturer:  “The Earth is hollow, and habitable within; containing a number of solid concentric spheres, one within the other, and that it is open at the poles 12 or 16 degrees; I pledged my life in support of this truth, and I am ready to explore the hollow, if the world will support and aid me in the undertaking.“

7:58:00 am

OM NAMAH SHIVAYA

शिव है धर्म का मूल

सत्यम, शिवम और सुंदरम


''शिव का द्रोही मुझे स्वप्न में भी पसंद नहीं।''- भगवान राम 


।।ॐ।। ओम नम: शिवाय।- 'ओम' प्रथम नाम परमात्मा का फिर 'नमन' शिव को करते हैं। 'सत्यम, शिवम और सुंदरम' जो सत्य है वह ब्रह्म है:- ब्रह्म अर्थात परमात्मा। जो शिव है वह परम शुभ और पवित्र आत्म तत्व है और जो सुंदरम है वही परम प्रकृति है। अर्थात परमात्मा, शिव और पार्वती के अलावा कुछ भी जानने योग्य नहीं है। इन्हें जानना और इन्हीं में लीन हो जाने का मार्ग है-हिंदुत्व।

शिव है प्रथम और शिव ही है अंतिम। शिव है सनातन धर्मका परम कारण और कार्य। शिव को छोड़कर अन्य किसी में मन रमाते रहने वाले सनातन विरुद्ध है। शिव है धर्म की जड़। शिव से ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष है। सभी जगत शिव की ही शरण में है, जो शिव के प्रति शरणागत नहीं है वह प्राणी दुख के गहरे गर्त में डूबता जाता है ऐसा पुराण कहते हैं। जाने-अनजाने शिव का अपमान करने वाले को प्रकृ‍ति कभी क्षमा नहीं करती है।

शिव का रूप : शिव यक्ष के रूप को धारण करते हैं और लंबी-लंबी खूबसूरत जिनकी जटाएँ हैं, जिनके हाथ में ‘पिनाक’ धनुष है, जो सत् स्वरूप हैं अर्थात् सनातन हैं, यकार स्वरूप दिव्यगुणसम्पन्न उज्जवलस्वरूप होते हुए भी जो दिगम्बर हैं। जो शिव नागराज वासुकि का हार पहिने हुए हैं, वेद जिनकी बारह रुद्रों में गणना करते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं उन शिव का रूप विचित्र है। अर्धनग्न शरीर पर राख या भभूत मले, जटाधारी, गले में रुद्राक्ष और सर्प लपेटे, तांडव नृत्य करते हैं तथा नंदी जिनके साथ रहता है। उनकी भृकुटि के मध्य में तीसरा नेत्र है। वे सदा शांत और ध्यानमग्न रहते हैं। इनके जन्म का अता-पता नहीं हैं। वे स्वयंभू माने गए हैं।

शिव निवास : ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर प्रारम्भ में उनका निवास रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ। जहाँ पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है। ऐसा पुराण कहते हैं।

शिव भक्त : ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।

शिव ध्यान : शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीम मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।

शिव मंत्र : दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥

शिव पर्व : महाशिवरात्रि भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। श्रावण मास में व्रत रखने के पश्चात्य इस पर्व को मनाया जाता है। इस पर्व को मनाने के नियम हैं।

शिव परिवार : शिव की अर्धांगिनी का नाम पार्वती है। इनके दो पुत्र हैं स्कन्द और गणेश। स्कंद को कार्तिकेय भी कहते हैं। आदि सतयुग के राजा दक्ष की पुत्री पार्वती माता को सती कहा जाता है। यह सती शब्द बिगड़कर 'शक्ति' हो गया। पार्वती नाम इसलिए पड़ा की वे पर्वतराज अर्थात पर्वतों के राजा की पुत्र थीं। राजकुमारी थीं, लेकिन वे भस्म रमाने वाले योगी शिव को अपना पति बनाना चाहती थीं। शिव के कारण ही उनका नाम शक्ति हो गया। पिता की ‍अनिच्छा से उन्होंने हिमालय के इलाके में ही रहने वाले योगी शिव से विवाह कर लिया।

शिव महिमा : शिव ने कालकूट नामक विष ‍पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर को जो वरदान दिया था उसके जाल में वे खुद ही फँस गए थे। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जानेपर शिव ने ब्रह्मा को शापित कर विष्णु को वरदानदिया था। शिव की महिमा का वर्णन पुराणों मेंमिलता है।

शैव परम्परा : ऋग्वेद में वृषभदेव का वर्णन मिलता है, जो जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ कहलाते हैं। माना जाता है कि शिव के बाद मूलत: उन्हीं से एक ऐसी परम्परा की शुरुआत हुई जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगम्बर और सूफी सम्प्रदाय में वि‍भक्त हो गई। फिर भी यह शोध का विषय है। शैव, शाक्तों के धर्मग्रंथों में शिव परंपरा का उल्लेख मिलता है। भारत के चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।

शिव के प्रमुख नाम : शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहाँ प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।

अमरनाथ के अमृत वचन : शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएँ हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।


शिव ग्रंथ : वेद और उपनिषद सहित ‍विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखित शिव-पुराण को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की भक्ति महिमा का उल्लेख है। इसमें शिव के अवतार आदि विस्तार से लिखे हैं।

शिवलिंग : आमतौर पर शिवलिंग को गलत अर्थों में लिया जाता है जो कि अनुचित है या उचित यह हम नहीं जानते। वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है।


वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही सबका आधार है। बिंदु एवं नाद अर्थात शक्ति और शिव का संयुक्त रूप ही तो शिवलिंग में अवस्थित है। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।

ज्योतिर्लिंग : ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएँ प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।

दूसरी मान्यता अनुसार विक्रम संवत के कुछ सहस्राब्‍दी पूर्व उल्कापात का अधिक प्रकोप हुआ। आदि मानव को यह रुद्र का आविर्भाव दिखा। शिव पुराण के अनुसार उस समय आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। कहते हैं कि मक्का का संग-ए-असवद भी आकाश से गिरा था। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया। । 


बारह ज्योतिर्लिंग : (1) सोमनाथ, (2) मल्लिकार्जुन, (3) महाकालेश्वर, (4) ॐकारेश्वर, (5) वैद्यनाथ, (6) भीमशंकर, (7) रामेश्वर, (8) नागेश्वर, (9) विश्वनाथजी, (10) त्र्यम्बकेश्वर, (11) केदारनाथ, (12) घृष्णेश्वर।

शिव चिन्ह : वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिन्‍ह की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिन्‍ह माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशुल को भी शिव का चिन्ह माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्ध चंद्र को भी शिव का चिन्ह मानते हैं।

शिव पार्षद : बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी, आदि ‍शिव पार्षद है।
शिव गण : भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है।
शिव के द्वारपाल : नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमामहेश्वर और महाकाल।
शिव पंचायत : सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।

शिव का दर्शन : शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में ‍जियो, वर्तमान में ‍जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

शिव प्रमाण : भारत ही नहीं विश्व के अन्य अनेक देशों में भी प्राचीनकाल से शिव की पूजा होती रही है। इसके अनेक प्रमाण समय-समय पर प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में भी ऐसे अवशेष प्राप्त हुए हैं जो शिव पूजा के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। शिव के एक गण नंदी ने ही कामशास्त्र की रचना की थी। कामशास्त्र के आधार पर ही कामसूत्र लिखा गया था।

अंतत: शिव के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है और इस भिन्नता का कारण है परम्परा और भाषा का बदलते रहना।। ॐ।।

शिव तेरे कितने नाम...।
शिव के पौराणिक शिवालय
पार्वती ही 'माता' हैं...।
शिव हैं योग का प्रारम्भ...



7:37:00 am

The unclassified NSA document that proves we intercepted 29 Extraterrestrial messages that were decoded

The unclassified NSA document that proves we intercepted 29 Extraterrestrial messages that were decoded

“The dangers of excessive concealment of facts, far outweigh the dangers that are cited to justify them. There is very grave danger, that an announced need for increased security, will be seized upon by those anxious to expand its meaning, to the very limits of official censorship and concealment – JFK”

On October 21, 2004 the National Security Agency (NSA) authorized the release of a then top secret document, NSA Journal Vol. XIV No 1, which is in fact a report presented to the NSA by Dr Howard Campaigne. The report addresses the decoding of extraterrestrial messages that were received from ‘outer space’. To verify the authenticity of the document, visit the following link: https://www.nsa.gov/public_info/_files/ufo/key_to_et_messages.pdfwhich will take you to the official website of the NSA.


According to reports, the messages were intercepted by the Sputnik satellite but no one had the necessary knowledge to decode them at the time they were received.

 

The document is composed of 29 extraterrestrial messages that were received in ‘Alien Code’.

The article reads the following:

KEY TO THE EXTRATERRESTRIAL MESSAGES

Dr. Campaigne presented a series of 29 messages from outer space in “Extraterrestrial Intelligence.” NSA Technical Journal, Vol. XI. No. 2. Pp 101 ff. The following article develops a key to these messages. Paragraph numbers parallel the serial numbers of the messages reprinted in the appendix below. This includes two new series -30 and 301- not included in the previous article.

 


Only a few people know about the existence of the unclassified document from the NSA that is considered by many as the irrefutable piece of evidence that extraterrestrial beings do exist. Why this document hasn’t been spread and shared is something that remains a mystery.

Titled Key to the ‘Extraterrestrial messages’, the unclassified document can be found on the official NSA website by visiting this link.

The official document was cleared for disclosure over 10 years ago, in October 2004, but mysteriously, the document wasn’t made available until April 2011. The Document is considered by Ufologists as one of the best pieces of evidence that suggest the government has knowledge of Aliens outside our solar system.

The document authored by a Dr. Campaigne, presents a series of 29 messages received from outer space.  Here’s an extremely interesting snippet from the journal:

“Recently a series of radio messages was heard coming from outer space. The transmission was not continuous, but cut by pauses into pieces which could be taken as units, for they were repeated over and over again.  The pauses show here as punctuation.  The various combination have been represented by letters of the alphabet, so that the messages can be written down.  Each message except the first is given here only once.  The serial number of the messages has been supplied for each reference.”


According to reports, Dr Campaigne is one of the best cryptologists working for the government and he was deemed as the best shot for deciphering the alien code.


Today we live in a time where information about Alien life and the UFO phenomenon is something that has become part of our everyday lives. In the online archives of dozens of countries, we can find countless documents that speak about Alien life and extraterrestrial visitations to planet Earth. Yet for some mysterious reason, no one has taken the matter seriously and analyzed the complete information thoroughly

4:51:00 am

Urdu की में लिखी गई श्री रामचरितमानस के 105 साल पुराने अंश कबाड़ी की दुकान से मिले

Urdu की में लिखी गई श्री रामचरितमानस के 105 साल पुराने अंश कबाड़ी की दुकान से मिले


अभी कुछ दिन पहले इंग्लैंड में कुरान के सबसे पुराने अंश मिले थे. हमने उस पर एक आर्टिकल भी किया था. अगर आप उसे पढ़ना चाहते हैं तो यह उस आर्टिकल का लिंक है gazabpost, लेकिन अब रामचरितमानस की लगभग 105 पुरानी प्रतियां मिल गई हैं.

कबाड़खाने में मिली प्रतियां

नई दिल्ली के कबाड़खाने से उर्दू में लिखी हुई रामचरितमानस की प्रतियां मिली हैं. गौरतलब है कि यह प्रति 1910 की लिखी हुई है, जो संभवत: लाहौर में लिखी गई होगी. तीन साल पहले हौज़ ख़ास के एक कबाड़ी ने इस प्रति को मात्र 600 रुपये में खरीदा था.

चोरी हुए थे दस्तावेज़

इसकी पांडुलिपि के संबंध में बनारस के संकट मोचन मंदिर में पूर्व कार्यरत पंडित के परिवार वालों का कहना है कि “उनके कुछ और मूल्यवान दस्तावेज़ों के साथ यह प्रतियां भी चोरी हो गई थीं.”


आखिर कौन था लेखक?

स्वामी तुलसीदास के प्रखर समर्थक शिव भरत लाल ने 1904 में इसे लिखा था. फ़िर 1910 में लाहौर से ये उर्दू में पुन: प्रकाशित हुई.

फ़िलहाल इस 105 साल पुरानी प्रति के 20 पृष्ठ मिले हैं, जिसमें से चार पृष्ठों पर हाथ से बनाये चित्र हैं. ये चित्र भगवान राम, विष्णु, महेश और हनुमान के हैं. संकट मोचन मंदिर के पंडित विशंभरनाथ मिश्रा ने बताया कि ‘बनारस पर अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन प्रतियों को हाथ में ले कर आश्चर्यचकित हुए थे.

4:48:00 am

भारत की इन 5 जगहों पर ख़ुद भारतीयों पर है ‘बैन’

भारत की इन 5 जगहों पर ख़ुद भारतीयों पर है ‘बैन’

बीते कई दिनों से सरकार ने कई चीज़ों को बैन कर दिया. कभी मैगी बैन, तो कभी पोर्न बैन, कभी फ़िल्में बैन, तो कभी किताबों पर लगाम लगाई जाती है. लेकिन इन सब के अलावा अगर मैं आपसे कहूं कि भारत में भारतीय भी बैन हैं, तो आप यकीन नहीं करेंगे! लेकिन ये सच है दोस्त, भारत की इन 5 जगहों पर भारतीयों का जाना भी बैन है.

1. Uno-In-Hotel, Bangalore

आईटी सेक्टर का तो बैंग्लोर गढ़ है. लेकिन अगर आप इंडियन हैं जनाब, तो इस होटल में कमरा मिलने वाला नहीं. ये होटल सिर्फ़ जपानियों के लिए है. ये होटल 2012 में निपोन इंफ्रास्कच्टर द्वारा बनवाया गया था. लेकिन 2014 में कुछ हादसे हो जाने पर इन्होंने इंडियंस् को आने से मना कर दिया.

2. Free Kasol

हिमाचल के कसौल में एक रेस्तरां में भारतीयों के आने पर मनाही है. अगर आप इंडियन हैं तो इस रेस्तरां में आपको खाना नहीं मिलने वाला क्योंकि यहां पासपोर्ट देखने के बाद एंट्री मिलती है.

3. गोवा का एक समुद्री किनारा सिर्फ़ विदेशियों के लिए

जी हां, जिस गोवा में आप अपने दोस्तों के साथ छुट्टियां मनाने जाते हैं, वहां एक समुद्री किनारा ऐसा भी है जहां सिर्फ़ विदेशी सैलानी ही जा सकते हैं. आपका जाना यहां वर्जित है.

4. चेन्नई का एक होटल

चेन्नई में एक क्षेत्रिय राजा की रियासत को एक छोटे से होटल में तब्दील कर दिया गया है. ये Triplicane के पास स्थित है. एक रिपोर्ट के अनुसार पहले इसका नाम Highlands था बाद में Broadlands कर दिया गया. यहां लोगों का पासपोर्ट देखने के बाद ही एंट्री मिलती है.

5. पुड्डूचेरी का Beach

गोवा के बाद पुड्डूचेरी का भी एक Beach है जहां सिर्फ़ विदेशी लोग ही जा सकते हैं. भारतीयों को यहां आना एक तरह से बैन है.

देखा आपने! अपने ही देश में कई जगहों पर हम जा नहीं सकते. ये होता है भेदभाव. लेकिन एक बात ये भी है कि हम भारतीयों की छवि कुछ भारतीयों ने ही विदेशियों के समक्ष खराब बना दी है. जिसमें सुधार करने के लिए हम सबको थोड़ा ऊपर उठना होगा.

4:44:00 am

खुदाई में मिले 800 साल पुराने बर्तन में मिले हैं लुप्त हो चुके रहस्यमयी पौधे के बीज

खुदाई में मिले 800 साल पुराने बर्तन में मिले हैं लुप्त हो चुके रहस्यमयी पौधे के बीज


आजकल अकसर ख़बरें आती हैं कि खुदाई के दौरान प्राचीन सभ्यता के बर्तन, बर्तन में रखा सदियों पुराना बटर, नहर प्रणाली आदि के अवशेष मिले हैं. लेकिन हाल ही में एक पुरातात्विक खुदाई के दौरान एक ऐसी चीज़ मिली थी, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी.

आपको बता दें कि इस खुदाई में एक 800 साल पुराना मिट्टी का बर्तन मिला था, जिसके अन्दर मिले थे कुछ बीज. अब पुरातत्वविदों की एक टीम को जांच करके ये पता लगाना है कि ये बीज किस फल. फूल या सब्जी के हैं. या ये किसी जंगली पौधे के बीज हैं. हो सकता है कि इन बीजों का उस समय काफी महत्त्व होता होगा, शायद इसीलिए इनको छुपा कर मिट्टी में गाड़ा गया होगा. और ये भी हो सकता है कि ये कोई साधारण बीज नहीं होंगे.

गौरतलब है कि ये बीज एक ऐसे बर्तन में मिले हैं, जो प्राचीन समय कि गवाही देता है. तो इसमें कोई शक नहीं है कि ये बीज भी किसी विलुप्त हो चुकी प्रजाति के पौधे के बीज ही होंगे. अब ये किस चीज़ के बीज हैं, ये तो इनको बोने के बाद इनसे निकलने वाले पौधों से ही सामने आएगा.

The Grid News के अनुसार, Canada में स्थित City of Winnipeg के कुछ छात्रों के एक ग्रुप ने यह प्रूव किया है कि ये बीज अभी भी उपजाऊ हैं. इस बात की पुष्टि नीचे दी गयी फ़ोटोज़ से होती है.

अब हम आपको दिखायेंगे एक वीडियो, जिसमें Baker Creek Heirloom Seed Company के Roger Smith समझा रहे हैं कि इनके दुर्लभ होने का प्रमाण कैसे मिला है? उन्होंने ने बताया कि उन्होंने इस बात पर गौर किया कि इन  बीजों की उम्र लगभग 850 साल है. इस बात का निर्धारण उन्होंने Carbon Dating के ज़रिये किया. इस ग्रुप का मुख्य उद्देश्य यह है कि दूसरे देशों तक इनको फैलाना, जो विशेष रूप से स्वदेशी आबादी की भूख मिटाने के लिए सक्षम होगा.

Smith ने खुद कुछ बीजों को बो कर उनको बढ़ते हुए देखा. इन बीजों से निकले पौधे शुरुआत में बहुत तेज़ी से बढ़ने लगे, इसके बाद उन्होंने देखा कि उनकी लतायें 25 फीट लम्बी हो गई. और इन लताओं में 10 से 12 करीब 18-पाउंड के सब्जी रुपी फल निकले. इसके बाद उन्होंने बताया कि इनका स्वाद बहुत मीठा और सौम्य था, लेकिन किसके जैसा था वो नहीं बता सकते. पर उनका ये कहना ही काफी है कि 'इसका स्वाद Squash जैसा था'.

4:39:00 am

आखिर नदी में सिक्के क्यों डाले जाते हैं, जानिए इसके पीछे का रहस्य

आखिर नदी में सिक्के क्यों डाले जाते हैं, जानिए इसके पीछे का रहस्य

अक्सर पर बस या ट्रेन से सफर करते वक्त जब नदियों के पास से गुजरते हैं, तो लोगों को सिक्का डालते हुए देखते हैं। सालों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी लोग निभा रहे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर हम नदी में सिक्का क्यों डालते हैं।

नहीं है अंधविश्वास
आप सोच रहे होंगे कि किसी तरह का अंधविश्वास होगा जिसकी वजह से लोग नदी में सिक्का डालते हैं। आपका ऐसा सोचना पूरी तरह से गलत है। इस रिवाज के पीछे एक वजह छिपी हुई है। दरअसल जिस समय नदी में सिक्का डालने की ये प्रथा शुरू हुई थी एस समय तांबे के सिक्के चला करते थे।

चूंकि तांबा पानी का प्यूरीफिकेशन करने में काम आता है इसलिए लोग जब भी नदी या किसी तालाब के आसपास से गुजरते थे तो उसमें तांबे का सिक्का डाल दिया करते थे। आज तांबे के सिक्के प्रचलन में नहीं हैं लेकिन फिर भी तब से चली आ रही इस प्रथा को लोग आज भी फॉलो कर रहे हैं।

होता है एक तरह का दान

ज्योतिष में भी कहा गया है कि लोगों को अगर किसी तरह का दोष दूर करना हो तो उसके लिए वो जल में सिक्के और कुछ पूजा की सामग्री को प्रवाहित करे। इसके साथ ही ज्योतिष में ये भी कहा गया है कि अगर बहते पानी में चांदी का सिक्का डाला जाए तो उससे अशुभ चुद्र का दोष खत्म होता है। यही नहीं पानी में सिक्का डालने की प्रथा को एक प्रकार का दान भी कहा गया है।

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